Deva Ki Raasleela (Indian sex stories)-Part 66

देवा, साली बहुत छोटा सुराख़ है तेरा आहह फँसा जा रहा है मेरा तो आहह ऐसी गाण्ड तो देवकी मामी की भी नहीं है। कोमल, आहह देवा रे। बहुत किस्मत वाली है तेरे मामी जो उसे तेरे जैसा बेटा मिला है आह्ह्ह। देवा, तू भी बन जाएँगी किस्मत वाली जब मेरी बहन इस घर में आएगी काकी। कोमल, अरे रानी बना कर रखूँगी मै तेरी बहन को ।बस तू अपनी इस काकी का ख्याल रखने आ जाया करना। आहह बोल आएगा न मेरी लेने उन्हह। देवा, हाँ तेरी गाण्ड मुझे कहीं से खीच लाएँगी कोमल। कोमल, आहह चोद अपनी कोमल को देवा आह्ह्ह्ह। देवा बिना रुके अपने लंड से कोमल की गाण्ड को खोलता चला जाता है और अपना पानी बहने के बाद प्रिया बिस्तर पर जा कर बैठ जाती है वो दिल ही दिल में सोच लेती है की उसे सुबह क्या करना है। सवेरा होते होते देवा कोमल को अपने पास से उसके रूम में भेज देता है और कोमल कमर पर हाथ रख कर लंगड़ाती हुए अपने बिस्तर पर जा कर लेट जाती है।सुबह कोमल के उठने से पहले प्रिया जग जाती है और वो देवा को भी जगा देती है । प्रिया के बापू भैसो का चारा लाने खेत में निकल चुके थे। देवा को अभी अभी नींद आई थी की प्रिया के उसे ज़ोर से हिलाने से वो हडबड़ा कर जग जाता है और सामने प्रिया को देख थोड़ा हैरान भी हो जाता है। देवा, क्या हुआ। प्रिया, चीखते हुए क्या हुआ। कमीने इंसान क्या समझ रखा है तुमने इस घर को। मै सब देख चुकी हूँ रात जो कुछ हुआ है यहाँ। अपना सामान उठाओ और वहीँ चले जाओ जहाँ से आये हो । क्यूंकि इस घर में तुम जैसे इंसानो के लिए कोई जगह नहीं और तुम्हारे बहन इस घर की बहु कभी नहीं बन सकती। मै हरी भाई से सब कुछ कह दूंगी । ये कहकर वो वहां रूकती नहीं बल्कि अपने रूम में चलि जाती है। देवा पर तो जैसे सुबह सुबह पहाड गिर पड़ा था। वो इधर उधर देखने लगता है और उसे कोमल दरवाज़े के आड़ में खड़ी दिखाई देती है।। प्रिया की बाते सुनकर कोमल के भी पांव तले की ज़मीन खिसक गई थी।
उधर देवा के गांव में विक्रांत कदम रखता है वो अपने मोटरसाइकिल पर बैठ कर जैसे ही गांव के कच्चे रास्ते से होता हुआ हवेली की तरफ बढ़ता है उसकी नज़र एक घर पर पडती है वो घर और किसी और का नहीं बल्कि शालु का था। नीलम, सुबह सुबह अपने गाये बकरियों को चारा खिला रही थी वो अभी अभी नहा कर बाहर आई थी। उसके बाल खुले हुए थे और गीले बालों पर पानी की हल्की हल्कि बूंदें सुबह की रौशनी में और भी ज़्यादा चमक रही थी। विक्रान्त, यहाँ शिकार करने आया था मगर वो नीलम की एक झलक पाकर जैसे खुद शिकार हो गया था। नीलम की नज़र अचानक से विक्रांत के तरफ चली जाती है और वो एक अजनबी आदमी को इस तरह उसे घूरता देख बुरी तरह डर जाती है और सीधा घर के अंदर जा कर दरवाज़ा विक्रांत के मुँह पर बंद कर देती है। विक्रान्त मुस्कराता हुआ अपनी बाइक शुरु कर देता है और हवेली की तरफ बढ़ जाता है। हवेली में रुक्मणी और रानी अभी अभी नहा कर बाथरूम से बाहर निकलती है जब से दोनों माँ बेटी का रिश्ता एक नए बंधन में बँधा था न रानी को हिम्मत राव की परवाह थी और न अब रुक्मणी हिम्मत में खोई रहती थी। बिंदिया अपने मालिक के साथ एक रूम में नंगी सोई हुई थी। रानी, अपने माँ के बाल सँवारते हुए उसके गाल को चूम लेती है। दोनो अभी आधी से ज़्यादा नंगी थी बस नीचे दोनों ने पेंटी पहन रखी थी। रुक्मणी, क्या बात है बड़ा प्यार आ रहा है आज कल अपनी माँ पर रानी। रानी, क्या माँ तुम भी न तुम सच में बहुत सुन्दर हो। रुक्मणी, रानी की ऑंखों में देखने लगती है।
जो सुख वो अपने पति से चाहती थी अपनी चूत में लगी आग को वो हिम्मत के लंड से बुझाना चाहती थी वही सुलगती हुई आग रानी अपनी ज़ुबान से बुझा रही थी। मगर ये वो आग होती है जो ज़ुबान से नहीं बुझती बल्कि ये तो और बढ़ती चली जाती है।। रानी, क्या देख रही हो माँ। रुक्मणी, कुछ नहीं सोच रही हूँ अब तेरे भी हाथ पीले कर दुं। रानी, माँ तुम भी न।। वो रुक्मणी के गले से लग जाती है और दोनों के ब्रैस्ट आपस में घिस जाते है और इस से एक चिंगारी सी पैदा होती है जो दोनों के तन बदन में फ़ैल जाती है। रानी, अपने दोनों हाथों से रुक्मणी की कमर को सहलाने लगती है। और रुक्मणी अपनी ऑंखें बंद कर लेती है । रानी की गरम साँसें उसे उसके होठो पर महसूस होती है।। रुक्मणी अपने ऑंखें खोल कर रानी कहते हुए अपने ज़ुबान बाहर निकाल कर रानी के होठो को चुमते हुए उसे अंदर डाल देती है दोनों एक दूसरे को चुमते हुए पेंटी के ऊपर से एक दूसरे की चूत को रगडने लगती है रानी, गलप्प माँ गलप्प। कि तभी बाहर से किसी की आवाज़ दोनों को चौंका देती है। रुक्मणी, इस वक़्त कौन हो सकता है।
बाहर खड़ा विक्रांत हिम्मत के नाम से आवाज़ देता है उसकी आवाज़ से बिंदिया और हिम्मत की आँख खुल जाती है और हिम्मत राव लुंगी पहनकर बाहर निकल आता है। हिम्मत, अरे विक्रांत आओ आओ इतनी सुबह सुबह। मुझे लगा था तुम दो दिन बाद आओगे। विक्रान्त, मुझे पैसों का काम था सोचा आपका काम जल्दी निपटा दूंगा तो मेरा भी काम बन जायेगा।। हिम्मत, बैठो। वो विक्रांत को घर के अंदर ले जाता है और गेस्ट रूम में बैठा कर बिंदिया के पास चला जाता है। बिंदिया, साडी पहनते हुए। कौन है जी। हिम्मत, बिंदिया मेरा दोस्त आया है जा ज़रा रुक्मणी और रानी को खबर कर दे । मुझे दोनों दिखाई नहीं दी रही है। बोल उन्हें की कुछ दिन यहाँ रहने के लिए शहर से मेरा दोस्त आया है। पीछे वाला कमरा साफ़ करवा दे किसी से। बिंदिया, रुक्मणि के रूम की तरफ जाने लगती है वो गेस्ट रूम के सामने से गुज़रती है। और एक उड़ती सी नज़र से विक्रांत की तरफ देखती है जैसे ही वो विक्रांत को देखती है उसके होश उड़ जाते है। उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगता है वो सोच में पड़ जाती है की ये गुण्डा यहाँ क्या कर रहा है। विक्रान्त की नज़र भी बिंदिया से टकरा जाती है और वो भी बिंदिया को देख सकते में पड़ जाता है। दोनों एक दूसरे को देखने लगते है के तभी वहां हिम्मत चला आता है। हिम्मत, तू गई नहीं और ऐसे क्या देख रही है। ये विक्रांत सेठ हैं शहर में रहते है। नमस्ते कर। बिंदिया, नमस्ते करने दोनों हाथ उठाती है मगर उसकी नज़र विक्रांत पर ही जम जाती है। इस तरह बिंदिया का विक्रांत को देखना हिम्मत को खटकने लगता है और वो बिंदिया को घूर कर देखता है।। बिंदिया सर झुका कर रुक्मणी के रूम में चली जाती है। रुक्मणी और रानी बाथरूम से बहार आ चुकी थी। रानी सिंगार दान के सामने बैठी हुई थी और रुक्मणी उसकी बाल संवार रही थी। बिंदिया , मालकिन… वो मालिक ने कहा है की उनका कोई दोस्त आया है शहर से । कुछ दिन यहीं रुकेगा। आपसे कहने के लिए कहा है की कोठी के पीछे वाला कमरा साफ़ करवा दो किसी से।

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